कुछ लोग ऐसे भी होते है
खाली कमरों के दीवारों में
यादों के तस्वीर सजाते हैं
जीते है पुराने ख्यालों में
उनकी प्रीत ही अलग होती है
कुछ लोग ऐसे भी होते है
रात के ठंडी हवाओ के शोर में
काले आकाश के तारो को
मुट्ठी में कसने की तमन्ना संजोते है
कुछ लोग ऐसे भी होते है
सर्द गर्म के फटे चादर ओढ़े
अनजान रास्तों में अपनी तकदीर के लकीरों को काटते फिरते है
तंग गलियों में आकाश को देखते देखते सो जाते है
कुछ लोग ऐसे भी होते है
शहर के जगमगाते तंग दीवारों के बीच
अपने पंखो को लोगो की सोच में बांधे
मर मर कर जी रहे है पर क्या खूब मुकुराते है
कुछ लोग ऐसे भी होते है
कर्म धर्म के मोह से अलग
मन को प्रतिज्ञान के भांति
मन को अपने अधीन बनाते है
कुछ ऐसे भी लोग होते है
जग के ताने बाने से अलग
अपने दुनिया को टूटे फूटे कंकरों से
किसी अंधियारी गली में सजाते है
कुछ लोग ऐसे भी होते है
कोरे कागज पर ख्वाबो के रंग कर जाते है
मुरझाते फूलों में भी मुस्कान के महक भर जाते है
अँधेरे रातो में तारो की जगमगाहट दे जाते है
खंडर महलो में एक उगते सूरज की रौशनी भर जाते है
लम्बे सफ़र पर जलती धुप में भी पेड़ो के छाव बन जाते है
ओस से भरी सर्दी की सुबह
गर्म धुप की मशाल बन जाते है
कुछ लोग ऐसे भी होते है
और उन कुछ लोगों में हमारा वजूद भी
एक पन्ने पर उकरने को तयार है अब |”