इंतेज़ार

तुझसे कहते कहते चुप रह जाता हूं
तेरे नैनों के शोर में गुम सा हो जाता हूं
शब्द लबो पे आते नहीं तेरे मौजूदगी में
और अकेलेपन मै कहानियां कह जाता हूं
दिन के उजाले से ढलती शाम तक तेरे अभिवक्ताओं को तस्वीरों ने कैद करना चाहता हूं मैं तेरे होंठो से निकले हर उस शब्द को बटोर कर अपनी कमीज़ की जेबों में भरना चता हूं मै
तेरे गुस्से से फूली नाक को छू कर तितलियों को बुलाना चाहता.
ही मैं
तेरी शरारत वाली फुलकारी हंसी को हर सुबह गुण गुनाना चाहता हूं मै थोड़ा सा ही फासला है तू हंस कर मज़ाक में ही कह दे
नंगे पांव चला आऊं दो जोड़े ख्वाब अपने कमीज़ की दाएं सिलवट में लपेटकर
वक्त को अर्जियां किनी मर्तबा भेज चुका हूं
पर ज़ालिम ज़रा और ठहर जाता तो क्या हो जाता
मुझे भी और तुझे भी जाना पड़ता है दूर हर मुलाक़ात के बाद नजर फेर कर
मै इंतेज़ार की गाड़ियों अपने पन्नों के साथ सील रहा हूं हांथ थामना बाकी रह गया बस तेरा ही इंतेज़ार कर रहा हूं

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