बेपरवाह

नींद से तुम इतने बेपरवाह बेवजह तो नही हो,
शायद तुम्हे आसमान को मापने का कोना मिल गया है,
खुलती बंद होती आँखो को छत के चकोर से अलग कर,
तुम खुद का ज़मीन बन रहे हो और यह दुनिया के लिए नया है,
उंगलियों को नया खेल सिखाते – सिखाते थकती नही हो?
कानो की बलियान और माथे की बिंदी तो बस यूँही तुम्हें छेर जाते हैं,
तुम यूँही मुस्कुराया करो इनके गुरूर को टूटने दो ज़रा,
फ़ुर्सत से ज़रा इनको भी तहज़ीब सिखादो की ये बस तुम्हारा ही साया है,
तुम रुकना मत बस उड़ना और रोशनी को रोशनी से रूबरू कराना,
उसको भी तो पता चले दर्पण मे खुदका अक्स देखना कैसा लगता है,
और जो कोई तुम्हारा रास्ता रोके ना उनपर ध्यान ना देना क्यूँ की उनका वक़्त बेसूध है,
और वे तुम्हारे अमोल समय के लायक नही, उन पर शब्द ख़रचना ज़ाया है,
यूँ तो मैं तुम्हारी राह मे अर्चन नही बनना चाहता,
पर क्या करे इस बैचैन दिल को समझना भी मुश्किल ही है मानो,
पर भरोसा रखो मैं अंधेरे मे बैठा पत्थर नही हूँ,
अगर मानो तो तपती धूप मे एक छोटा सा छाया हूँ,
गुजर जाउन्ग और पता भी नही चलेगा!

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