सिलसिला

हँसी के पिटारे मे हाथ डाल
तुम्हारी यादों का सिलसिला शुरू कर दिया,
ख़यालों के रंगो से बाल धो कर
तूने नये परिंदों को झटक दिया,
यह परिंदें उस आज़ाद गगन के हो गये,
जहाँ बादलों की पगडंडी मे तारें घूमा करते हैं.

गीले शीशे मे से रोशनी की फुहार
बिस्तर के चादर को और नर्म किए हुए है,
तारीखों की सीढ़ियाँ दीवारों को छूते
और तुम्हारा ही एहसास लिए हुए हैं,
भूरी लकड़ी पर नाम खरोच कर क्यों तुम अपना मुकाम बदल रहे हो?
चाहते तो सब कुछ ही हो पर सवाल क्यों इतना किए हुए हो?

तुमने जो फूल दिया था अपने सफेद इरादों से
वो भी मैने अपने कविताओं के पन्नो मे सज़ा रखा है,
इंतेज़ार है की तुम आकर पलटोग और पढ़ोगे इससे,
फिर मेरे भी होकर नये रंगों को काँच के ग्लास मे भर लोगे,
काग़ज़ के पर्दों मे सहमता से नाम तो लिखो, तुम्हारा और मेरा,
साथ मे मेरा भरोसा लेलो की उसे मैं नीले काले रंग से सज़ा कर आसमान मे बिच्छा दूँगा
और वो वहाँ तब तक रहेगा जब तक हम अपनी आँखें बंद कर सो ना जाए |

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